Thursday, December 20, 2018
Wednesday, December 12, 2018
Saturday, December 8, 2018
Thursday, September 20, 2018
Wednesday, July 11, 2018
Saturday, April 14, 2018
Tuesday, April 3, 2018
Saturday, March 3, 2018
Saturday, January 27, 2018
Thursday, January 18, 2018
Monday, January 9, 2017
महिला द्वारा पति व ससुराल पर अत्याचार का झूठा मामला बन सकता है तलाक का आधार: हाई कोर्ट
बम्बई उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि किसी महिला द्वारा अपने पति तथा ससुराल के लोगों पर अत्याचार का झूठा मामला दर्ज कराना भी तलाक का आधार बन सकता है।अदालत की पीठ ने हाल में एक मामले में तलाक मंजूर करते हुए कहा हमारी नजर में एक झूठे मामले में पति और उसके परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी से हुई उनकी बेइज्जती और तकलीफ मानसिक प्रताड़नादेने के समान है और पति सिर्फ इसी आधार पर तलाक की माँग कर सकता है।
न्यायाधीश न्यायमूर्ति एपी देशपांडे तथा न्यायमूर्ति आरपी सोंदुरबलदोता की पीठ ने पारिवारिक अदालत के उस फैसले से असहमति जाहिर की, जिसमें पत्नी द्वारा पति तथा उसके परिजनों के खिलाफ एक शिकायत दर्ज करवाना उस महिला के गलत आरोप लगाने की आदत की तरफ इशारा नहीं करता।
पीठ ने कहा हम पारिवारिक अदालत की उस मान्यता सम्बन्धी तर्क को नहीं समझ पा रहे हैं कि सिर्फ एक शिकायत के आधार पर पति और उसके परिवार के लोगों की गिरफ्तारी से उन्हें हुई शर्मिंदगी और पीड़ा को मानसिक प्रताड़ना नहीं माना जा सकता। यह बेबुनियाद बात है कि मानसिक प्रताड़ना के लिए एक से ज्यादा शिकायतें दर्ज होना जरूरी है।
यह मामला आठ मार्च 2001 को वैवाहिक बंधन में बँधे पुणे के एक दम्पति से जुड़ा है। पति ने आरोप लगाया था कि शादी की रात से ही उसकी पत्नी ने यह कहना शुरू कर दिया था कि उसके साथ छल हुआ है, क्योंकि उसे विश्वास दिलाया गया था कि वह मोटी तनख्वाह पाता है। पति का आरोप है कि उसकी पत्नी ने उसके तथा अपनी सास के खिलाफ क्रूरता का मुकदमा दायर किया था। बहरहाल, निचली अदालत ने सुबूतों के अभाव में दोनों लोगों को आरोपों से बरी कर दिया था।
उसके बाद पति ने पारिवारिक अदालत में तलाक की अर्जी दी थी, लेकिन उस अदालत ने कहा कि पत्नी द्वारा एकमात्र शिकायत दर्ज कराने का यह मतलब नहीं है कि उसे झूठे मामले दायर कराने की आदत है। अदालत ने कहा था कि महज इस आधार पर तलाक नहीं लिया जा सकता। बहरहाल, बाद में उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले से असहमति जाहिर की।
Sunday, March 24, 2013
क्या है एफआईआर :-
किसी अपराध की सूचना जब किसी पुलिस ऑफिसर को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यहसूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।
किसी अपराध की सूचना जब किसी पुलिस ऑफिसर को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यहसूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।
आपके अधिकार
- अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआरकी एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है। एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता , न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है। संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके साइन कराए। एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के साइन होने चाहिए। साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।
- अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है , तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है। एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।
- अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं, तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।
- अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।
- एफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा - निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।
- अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।
- अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रशन पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ - साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।
- अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच - पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी , तो केस उस थाने को ट्रांसफर हो जाएगा।
- अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की केस की जांच - पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को Dying Declaration की तरह अदालत में पेश किया जा सकता है।
- अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।
Friday, September 7, 2012
DOMESTIC VIOLENCE
- अनचाहे यौन संबंध बनाने के लिए बाध्य या दमित करता है?
- आपको या अन्यों को मारने-पीटने की, घर से निकालने या निजी जानकारी देने के लिए धमकी देता है?
- आप क्या करती है या क्या देखती हैं उसे नियंत्रित करता है जो एक प्रकार से आपके काम, शिक्षा या अन्य व्यक्तिगत गतिविधियों में हस्तक्षेप करता है?
- आपकी निरंतर आलोचना करता है। गाली-गलौच करता है या आपको नीचा दिखाता है?
- आपकी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे खाना,घर, कपड़े या चिकित्सा और शारीरिक सहायता से वंचित रखता है? आपकी कमाई को खुद रख लेता है?
यदि उपरोक्त में से किसी भी प्रश्न का उत्तर हां हैं। तो अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने की आवश्यकता है।
घरेलू हिंसा से बचावे के लिए उपाय :
महत्वपूर्ण फोन नंबर, आश्रय स्थल, कालिंग कार्ड और कुछ पैसा हमेशा अपने पोस रखें।
महत्वपूर्ण फोन नंबर, आश्रय स्थल, कालिंग कार्ड और कुछ पैसा हमेशा अपने पोस रखें।
- अन्य जिनपर आप विश्वास करती हैं, जैसे मित्रों, परिवार या सामुदायिक सदस्यों को बताएं कि आप पर क्या बीत रही है,तथा किन तरीकों से आपकी सहायता की जा सकती है।
- ऐसे रास्तों और स्थानों की खोज करके रखें जहां आप आवश्यकता पडऩे पर तुंरत जा सकें। यदि तर्क-वितर्क होने लगे तो ऐसे कमरे में जाएं जहां से बाहर निकला जा सके। रसोईघर, स्नानघर या ऐसे स्थानों पर जाने बचें जहां हथियार हो सकते हों।
- उस स्थान के बारे में सोचें जहां यदि आपको घर छोडऩा पड़ा तो आप जा सकें ( चाहे आपको लगे कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं हैं। तब भी)
- रक्षा योजना के बारे में अपने बच्चों से बात करें और शीघ्र घर छोडऩे के संकेत का कोड बनाएं। उनसे चर्चा करें कि यदि कोई हिंसक घटना हो या वे डर जाएं तो क्या करें।
- एक संकटकालीन बैग तैयार करें और इसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति के पास या सुरक्षित स्थान पर रखें। इसमें ये वस्तुएं होनी चाहिए। पैसा, चेकबुक है। यदि वाह न तो उस अतिरिक्त चाबियां, दवाएं, महत्वपूर्ण दस्तावेजों जन्म-प्रमाण पत्र ( बच्चों के दस्तावेज समेत) की मूल या फोटोप्रतियां, ड्राइविंग लाइसेंस, विवाह प्रमाण-पत्र इत्यादि भावनात्मक महत्व की वस्तुएं।
- कुटुम्ब के
भीतर होने वाली घरेलू हिंसा से निपटने के लिये घरेलू हिंसा से महिलाओं का
संरक्षण अधिनियम 2005 बनाया गया है जो 26 अक्टूबर 2006 से प्रभावशील हुआ
है । अधिनियम को प्रभावी ढंग में लागू किये जाने के लिए घरेलू हिंसा में
महिलाओ का संरक्षण नियम 2006 के अंतर्गत नियम भी बनाये गये हैं।
घरेलू हिंसा से तात्पर्य कोई कार्य या हरकत जो किसी पीड़ित महिला एवं बच्चों (18 वर्ष से कम उम्र के बालक एवं बालिका) के स्वास्थ्य, सुरक्षा जीवन को खतरा/संकट की स्थिति, आर्थिक नुकसान, क्षति जो असहनीय हो तथा जिससे महिला बच्चे दुखी व अपमानित हो से है । इसके अंतर्गत शारीरिक मौखिक व भावनात्मक लैंगिग व आर्थिक हिंसा या धमकी देना आदि शामिल है।
घरेलू हिंसा के अंतर्गत हमला,आपराधिक अभित्रास, बल, महिला की गरिमा का दुरूपयोग ,अपमान, उपहास, तिरस्कार और विशेष रूप से संतान नर बालक के न होने के संबंध में ताना और हितबद्ध व्यक्ति को शारीरिक पीडा कारित करने की लगातार धमकिया देना, स्त्रीधन, व्यथित द्वारा संयुक्त रूप से या पृथकतः स्वामित्व वाली सम्पत्ति, साझी गृहस्थी और उसके रखरखाव से संबंधित भाटक के संदाय, से वंचित करना, स्थावर, मूल्यवान वस्तुओं, शेयरों , प्रतिभूतियों बंधपत्रों और इसके सदृश या अन्य सम्पत्ति का कोई अन्य संक्रामण, साझी गृहस्थी तक पहंुच के लिए प्रतिषेध या निर्बन्धन आदि शामिल है ।
अधिनियम के अंतर्गत पीडित पक्षकार में विवाहित, अविवाहित के अलावा अन्य रिश्तों में रह रही विवाहित, विधवा, मॉ, बहन, बेटी, बहूंॅ, शादी के बगैर साथ रह रही महिला या दूसरी पत्नी के रूप में रह रही या रह चुकी महिला। धोखे से किया गया विवाह/अवैध विवाह वाली महिला शामिल है।
अधिनियम में किसी भी व्यस्क पुरुष सदस्य के खिलाफ, जिसके साथ महिला बच्चे का घरेलू रिश्ता है या था, के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। घरेलू से तात्पर्य एक ही छत/घर के नीचे संयुक्त परिवार/ एकल परिवार के पारिवारिक सदस्य जो समरक्तता/संगोत्रता/दस्तक/विवाह द्वारा बनाये गए रिश्ते के रूप में रह रहे या रह चुके महिला एंव बच्चे ।
पूर्व में इस संबंध में मतभेद था कि क्या पति या पुरूष साथी के महिला रिश्तेदार को प्रत्यर्थी बनाया जा सकता है या नहीं और इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत 2011 ए0आई0आर0 एस0सी0डब्ल्यू 1327 संध्या मनोज वानखेडे विरूद्ध मनोज वामनराव वानखेडे में यह प्रतिपादित किया गया है कि व्यथित पत्नी या विवाह के प्रकृति के संबंध में रहने वाली महिला पति या पुरूष साथी के किसी भी रिश्तेदार के विरूद्ध परिवाद ला सकती है चाहे वह रिश्तेदार महिला हो या पुरूष हो अर्थात महिला के विरूद्ध भी शिकायत की जा सकती है ।
अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषताएं
01. इस कानून के तहत् घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए न्यायालय को धारा 12 में आवेदन प्राप्त होने के 03 दिन के भीतर पहली सुनवाई में न्यायाधीश बचावकारी आदेश दे सकते हैं।
02. न्यायालय प्रत्येक आवेदन की प्रथम सुनवाई की तारीख से 60 दिनों के अन्दर निपटारा करने का प्रयास करेगा।
03. अधिनियम घरेलू रिश्तों में रहते हुए भी आपत्तिजनक व्यवहारों को सुधारने का पूरा मौका देता है।
04. यह कानून महिलाओं बच्चों को अपने घर में स्वतंत्र व सुरक्षित रहने का अधिकार देता है, भले ही उस घर पर उनका मालिकाना हक हो या न हो।
05. यह एक दिवानी कानून है। इस कानून में दोषी को सजा दिलाने के बजाय पीड़ित के संरक्षण एवं बचाव पर जोर दिया गया है ।
06. न्यायालय का आदेश न मानने पर दोषी व्यक्ति को एक साल तक की अवधि की सजा या रुपये 20 हजार तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
07. इस कानून के अनुसार महिला के साथ हुई घरेलू हिंसा के साक्ष्य के प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। एकमात्र महिला द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों एवं बयानों को ही विश्वसनीय माना जावेगा तथा उस आधार पर ही न्यायाधीश आदेश दे सकते हैं कि हिंसा रोकी जावे और महिला को संरक्षण प्रदान किया जावे।
08. पीड़िता को, न्यायालय, द्वारा पारित सभी आदेशों की प्रतियां निःशुल्क प्रदाय की जाएगी।
09. यदि न्यायाधीश ऐसा समझते हैं कि परिस्थितियों के कारण मामले की सुनवाई बंद कमरे में किया जाना आवश्यक है तो या पीड़ित पक्ष ऐसी मांग करे तो मामले की कार्यवाही बंद कमरे में की जा सकेगी।
10. यदि न्यायाधीश को पीड़ित व्यक्ति या दोषी से आवेदन प्राप्त होने पर यह समाधान हो जाता है कि परिस्थितियों में सुधार हुआ है तो पूर्व आदेश में परिवर्तन, संशोधन या निरस्त कर सकते हैं।
11. पीड़िता के पूर्व में चल रहे अदालत के केस के अतिरिक्त भी इस कानून में संरक्षण एवं सहायता प्रदान की जा सकती है । घरेलू हिंसा के केस के साथ अन्य कानून के अंतर्गत चल रही कार्यवाही एक साथ चल सकती है।
12. महिला घटना स्थल या वर्तमान में जहंा निवासरत है, वहां केस दर्ज करा सकती है। पीड़िता जहंा उचित समझे उस क्षेत्र के मजिस्टेªट को आवेदन दे सकती है।
अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाली सहायता एंव राहत
01. न्यायाधीश यह समझता है कि नियम के तहत किसी पीड़ित व हिंसाकर्ता को अकेले या संयुक्त रूप से सेवा प्रदाता (पुलिस परिवार परामर्श केन्द्र) के किसी सदस्य को परामर्श देने की पात्रता और अनुभव रखते हों तो उससे परामर्श लेने का निर्देश दे सकते हैं।
02. परामर्श में हुए समझौते की कार्यवाही अनुसार मजिस्टे््र्रट संरक्षण एवं सहायता के आदेश जारी कर सकते हैं।
03. यदि न्यायाधीश को लगता है कि घरेलू हिंसा हुई है और पीड़ित व्यक्ति को हिंसाकर्ता से आगे भी खतरा है, ऐसी स्थिति में संरक्षण आदेश धारा-18 में दे सकता है ।
04. संरक्षण आदेश घरेलू हिंसा करने, हिंसा में सहयोग करने या प्रेरित करने से रोकने दिये जा सकते हैं।
05. हिंसाकर्ता को पीड़ित द्वारा उपयोग किए जाने वाले घर में प्रवेश पर रोक, लगाई जा सकती है ।
06. अगर पीड़ित की रिपोर्ट से जज को ऐसा लगता है कि पीड़ित को हिंसाकर्ता से आगे भी खतरा है, तो हिंसाकर्ता (पुरुष) को घर के बारह रहने का आदेश भी दिया जा सकता है या
07. घर के जिस भाग में पीड़ित व्यक्ति का निवास है या विद्यालय/महाविद्यालय में जाने से हिंसाकर्ता को मना कर सकता है।
08. किसी भी पुरुष से व्यक्तिगत, मौखिक, लिखित टेलीफोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सम्पर्क करने से मना किया जा सकता है ।
09. पीड़ित पर आश्रित व्यक्ति बच्चों या सहायता करने वाले व्यक्तियों पर हिंसा से रोकना। आदेश दिया जा सकता है ।
10. संयुक्त या जिस संपत्ति पर पीड़ित का हक बनता है ऐसी संपत्तियों का लेन-देन या संचालन पर रोक। लगाई जा सकती है ।
11. स्त्री धन, आभूषण, कपड़ों इत्यादि पर कब्जा देना।
12. आपसी विवाह के संबंध में बात करने या उनकी पसंद के किसी व्यक्ति से विवाह के लिए मजबूर न करना।
13. दहेज की मांग के लिए परेशान करने से रोकना।
14. न्यायालय के आदेश के बिना बैंक में संधारित लॉकर्स एवं संयुक्त बैंक खातों से राशि, सामग्री हिंसाकर्ता नहींे निकाल सकेगा।
15. पीड़िता और उसके बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई अन्य उपाय।
16. पीड़ित को साझी गृहस्थी में रहने का आदेश दिया जा सकता है । चाहे उसमें उसका मालिकाना हक न हो।
17. अगर जरूरत महसूस हो तो आदालत आरोपी को यह आदेश दे सकती है कि पीड़िता जैसी सुविधा में साझे रूप में निवास कर रही थी वैसा ही किराए का घर उसे रहने के लिए उपलब्ध करावें।
18. पीड़िता एवं उसके बच्चे घर में या घर के किसी भाग में निवास करते हैं, या कर चुके हैं, तो उसे घर के उस भाग में रहने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
19. हिंसाकर्ता उस मकान को न तो बेच सकता है न उस पर ऋण ले सकता है न ही किसी के नाम से हस्तांतरित कर सकता है।
20. न्यायालय पीड़िता की मांग पर उसे उसके बच्चों को अभिरक्षा में देने का अस्थायी आदेश दे सकता है।
21. पीड़िता की रिपार्ट से न्यायाधीश यह समझते हैं कि हिंसाकर्ता के बच्चे से मिलने/भंेट करने से खतरा उत्पन्न हो सकता है तो वह हिंसाकर्ता को कहीं भी बच्चों से नहीं मिलने का ओदश दे सकते हैं।
22. पीड़िता और उसके बच्चों का भरण-पोषण, चिकित्सीय खर्च, कपड़े, हिंसा की वजह से हुए किसी सम्पत्ति का नुकसान या हटाए जाने के कारण हुए नुकसान का मुआवजा देने का ओदश देगा।
23. अदालत मानसिक यातना और भावनात्मक पीड़ा जो रिस्पॉडेंट द्वारा घरेलू हिंसा के कृत्यों द्वारा पहुंचायी गई है उसकि क्षतिपूर्ति और जीविका की क्षतिपूर्ति का भुगतान करने के लिए दोषी को आदेश दे सकेगी।
24. सुरक्षा की दृष्टि से या अन्य कारणों से यदि पीड़िता अपने परिवार के साथ रहना नहीं चाहती है, तो ऐसी स्थिति में राज्य शासन निःशुल्क आश्रय की सुविधा उपलब्ध करायेगा।
25. शासन द्वारा अधिकृत चिकित्सा सुविधा प्रदाता पीड़िता की प्रार्थना/आवेदन पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध करायेगा
26. घरेलू हिंसा की रिपोर्ट न दर्ज होने पर भी चिकित्सा सहायता या परीक्षण के लिए चिकित्सक मना नहीं करेगा और उसकी रिपोर्ट स्थानीय पुलिस थाना एवं संरक्षण अधिकारी (परियोजना अधिकारी, महिला एवं बाल विकास) को भेजेगा।
27. ’’घरेलू हिंसा’’ का अर्थ मामले के सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करके निकाला जाएगा ।
28. अधिनियम के अंतर्गत एक पक्षीय अंतरिम आदेश न्यायालय तत्काल पारित कर सकता है ।
29. अधिनियम के अंतर्गत पारित आदेश के विरूद्ध 30 दिन के अंदर व्यथित पक्षकार सत्र न्यायालय में अपील कर सकता है ।
30. अधिनियम के अंतर्गत अपराध सज्ञेय एंव अजामनतीय है ।
31. अधिनियम के अंतर्गत पारित आदेश के पालन हेतु पुलिस सहायता दी जा सकती है ।
32. पुलिस में घरेलू हिंसा की रिपोर्ट किये जाने पर यदि भारतीय दण्ड संहिता या अन्य विधि के अधीन किया गया अपराध प्रकट होता है तो नियमानुसार पुलिस द्वारा कार्यवाही की जाएगी ।
33. यदि पुलिस को घरेलू ंिहंसा की जानकारी मिलती है तो वे तत्काल घटना स्थल पर जाएगें और घरेलू दुर्घटना की रिपोर्ट तैयार करेगें ।
34. इस अधिनियम के अधीन समुचित आदेश प्राप्त करने के लिए उस रिपोर्ट को पुलिस द्वारा अविलम्ब मजिस्ट्रेट को भेजी जाएगी ।
35. संरक्षण अधिकारी के द्वारा कर्तव्य का निर्वाहन न करने पर उसे दण्डित किये जाने के प्रावधान है ।
36. अधिनियम में पीडिता को निःशुल्क विधिक सहायता दिलाये जाने का प्रावधान भी किया गया है ।
37. अधिनियम के प्रावधान प्रचलित विधियो के अतिरिक्त होगे उनके अन्यूनीकरण नहीं करेंगे ।
सरकार के कर्तव्य
इस अधिनियम में न केवल पुलिस अधिकारी, सरंक्षण अधिकारी, सेवा प्रदाता, मजिस्ट्रेट पर कर्तव्य अधिरोपित किये गये हैं । बल्कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार पर भी कर्तव्य अधिरोपित किये गये है ।जो निम्नलिखित है-
01. ऐसे उपाय करना जिससे इस अधिनियम के उपबंधो का जन संचार के माध्यम से व्यापक प्रचार हो सके जैसे टेलीविजन, रेडियों और प्रिंट मिडिया के माध्यम से नियमित अंतराल में प्रचार करना ।
02. पुलिस अधिकारी और न्यायिक सेवा के सदस्यों को जो इस अधिनियम से संबंधित है उन्हें समय समय पर प्रशिक्षण देना ताकि वे अधिनियम से संबंधित विषयो की जानकारी और उनके बारे में संवेदनशील हो सके ।
03. विभिन्न मंत्रालयों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करना जो कि इस अधिनियम से संबंध रखते है ।
04. यह देखना की महिलाओ को इस अधिनियम के अधीन उपलब्ध सेवाएं मिल सके इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों में प्रोटोकाल की व्यवस्था और न्यायालय स्थापित करना शामिल है ।
मध्य प्रदेश शासन के द्वारा महिला एंव बाल विकास विभाग मंत्रालय, भोपाल ने दिनांक 09 जनवरी 2007 के आदेश द्वारा विकास खण्ड/परियोजन स्तर पर शहरी और ग्रामीण आदिवासी परियोजनाओ के बाल विकास परियोजना अधिकारियों को संरक्षण अधिकारी नियुक्त किया है जहां बाल विकास परियोजना स्वीकृत नहीं है उन क्षेत्रो में जिला कार्यक्रम अधिकारी/जिला महिला एंव बाल विकास अधिकारी को संरक्षण अधिकारी नियुक्त किया है ।
घरेलू हिंसा में महिलाओ का संरक्षण नियम 2006 के अंतर्गत बनाये गये नियम में संरक्षण अधिकारी के निम्नलिखित कर्तव्य बताये गये है-
01. पीडिता की ओर से घरेलू हिंसा की रिपोर्ट प्रारूप 1 मे तैयार करना और स्थानीय पुलिस थाना सेवा प्रदाता, विधिक सहायता अधिकारी एंव मजिस्ट्रेट को भेजना ।
02. पीडित व्यक्ति के अनुरोध पर आश्रय गृह एंव चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाना।
03. कोर्ट आने जाने, आश्रय गृह आदि के लिए परिवहन की निःशुल्क व्यवस्था उपलब्ध करवाना ।
04. न्यायालय में आवेदन फाईल करने के लिए भारत सरकार के निर्धारित प्रारूप 2,3, एंव 5 में आवेदन तैयार करने में सहयोग करना ।
05. पीडित व्यक्ति को राज्य विधिक सहायता प्राधिकरण द्वारा निःशुल्क सहायता उपलब्ध करवाना ।
06. न्यायालय के संमस/नोटिस तामील करवाना।
07. मजिस्ट्रेट के निर्देश पर घरेलू हिंसा की घटना की जांच कर रिपोर्ट देना ।
इस प्रकार संरक्षण अधिकारी मजिस्ट्रेट और पीडिता के बीच की कडी के रूप में कार्य करेगा और उसकी जिम्मेदारी है कि वह सभी कानूनी सहायता निःशुल्क पीडित महिला और उसके बच्चो को प्रदान करे एंव उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखे ।
अधिनियम के अंतर्गत पीडिता शिकायत सीधे क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट के पास, स्थानीय पुलिस थाना, संरक्षण अधिकारी परियोजना अधिकारी, महिला एंव बाल विकास विभाग, सेवा प्रदाता-पुलिस परिवार परामर्श केन्द्र एंव पंजीकृत आश्रय गृह में कर सकती है।
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